Napoleon Bonaparte (hindi)

Napoleon Bonaparte (hindi)

Price: ₹ 120.00
(as of Jul 31,2021 23:53:18 UTC – Details)

ISRHEWs

नेपोलियन बोनापार्ट के कुछ महत्त्वपूर्ण विचार लोग अपने अधिकारों की अपेक्षा अपने स्वार्थों के लिए ज्यादा मजबूती से लड़ते हैं। सच्चा आदमी किसी से नफरत नहीं करता। अवसरों के बिना योग्यता धरी-की-धरी रह जाती है। चार विरोधी अखबार हजारों संगीनों से ज्यादा डरावने हो सकते हैं। महत्त्वाकांक्षा किसी महानायक का जुनून हो सकती है। जो इससे प्रेरित होते हैं, वे बहुत अच्छे या बहुत बुरे कार्य कर सकते हैं। जो जीत के प्रति आशंकित होता है, वह निश्‍चित रूप से हारता है। मेरी आपके लिए एक ही सलाह है, त्रुटिहीन बनो। यदि मुझसे धर्म का चुनाव करने के लिए कहा जाए तो सार्वभौमिक जीवनदाता सूर्य को मैं अपना ईश्‍वर चुनूँगा। यदि तुम चाहते हो कि कोई काम एकदम ठीक से हो तो उसे स्वयं करो। किसी लोकप्रिय शख्सियत को नजदीक से देखा जाए तो उसकी गरिमा का पर्वत भरभरा उठता है। नेपोलियन बोनापार्ट ने फ्रांसीसी क्रांति के एक जनरल से लेकर सम्राट्ï नेपोलियन बोनापार्ट तक का सफर तय किया। वह 11 नवंबर, 1799 से लेकर 18 मई, 1804 तक फ्रेंच रिपब्लिक के पहले काउंसिल के रूप में फ्रांस के शासक रहे। 18 मई, 1804 से लेकर 6 अप्रैल, 1814 तक वे नेपोलियन प्रथम के रूप में फ्रांस के सम्राट्ï और इटली के राजा थे। किसी भी भूमिका में वे पश्‍चिम के इतिहास के अब तक के सबसे यशस्वी व्यक्‍तित्वों में से एक हैं। वे फ्रांसीसी राज्य के सैन्य विस्तार के लिए समर्पित थे, जिसके लिए उन्होंने सैन्य संगठन और प्रशिक्षण में क्रांति ला दी। दुनिया भर की सैन्य अकादमियों में उनके अभियानों का अध्ययन किया जाता है और उन्हें अब तक का एक महानतम कमांडर माना जाता है। नेपोलियन के कई सुधारों ने फ्रांस के संस्थानों और पश्‍चिमी यूरोप के अनेक हिस्सों पर अमिट छाप छोड़ी। अपने जीवनकाल में उन्होंने बहुत सम्मान अॢजत किया और इसीलिए उन्हें इतिहास का एक महानायक माना गया। एक महान् शासक और सेनानायक की प्रेरणादायक एवं पठनीय जीवनगाथा।.




From the Publisher

Napoleon Bonaparte by Vimal Kumar

Napoleon Bonaparte by Vimal Kumar
Napoleon Bonaparte by Vimal Kumar

इटली का अभियान नैपोलियन की सैनिक तथा प्रशासकीय क्षमता का ज्वलंत उदाहरण था।

पोलियन कार्सिका और फ्रांस के एकीकरण के अगले वर्ष ही १५ अगस्त १७६९ ई॰ को अजैसियों में पैदा हुआ था। उसके पिता चार्ल्स बोनापार्ट एक चिरकालीन कुलीन परिवार के थे। उनका वंश कार्सिका के समीपस्थ इटली के टस्कनी प्रदेश से संभूत बताया जाता है। चार्ल्स बोनापार्ट फ्रेंच दरबार में कार्सिका का प्रतिनिधित्व करते थे। उन्होंने लीतिशिया रेमॉलिनो (Laetitia Ramolino) नाम की एक उग्र स्वभाव की सुंदरी से विवाह किया था जिससे नैपोलियन पैदा हुआ। चार्ल्स ने फ्रेंच शासन के विरुद्ध कार्सिकन विद्रोह में भाग भी लिया था, किंतु अंतत: फ्रेंच शक्ति से साम्य स्थापित करना ही श्रेयस्कर समझा। फ्रेंच गवर्नर मारबिफ (Marbeuf) की कृपा से उन्हें वर्साय की एक मंत्रणा में सम्मिलित होने का अवसर भी मिला। चार्ल्स के साथ उसकी द्वितीय पुत्र नैपोलियन भी था। उसके व्यक्तित्व से जिस उज्वल भविष्य का संकेत मिलता था उससे प्रेरित होकर फ्रेंच अधिकारियों ने ब्रीन (Brienne) की सैनिक अकैडैमी में अध्ययन करने के लिए उसे एक छात्रवृत्ति प्रदान की और वहाँ उसने १७७९ से १७८४ तक शिक्षा पाई। तदुपरांत पैरिस के सैनिक स्कूल में उसे अपना तोपखाने संबंधी ज्ञान पुष्ट करने का अवसर लगभग एक वर्ष तक मिला। इस प्रकार नैपोलियन का बाल्यकाल फ्रेंच वातावरण में व्यतीत हुआ।

बाल्यवस्था में ही सारे परिवार के भरण पोषण का उत्तरदायित्व कोमल कंधों पर पड़ जाने के कारण उसे वातावरण की जटिलता एवं उसके अनुसार व्यवहार करने की कुशलता मिल गई थी। अतएव फ्रेंच क्रांति में उसका प्रवेश युगांतरकारी घटनाओं का संकेत दे रहा था। फ्रांस के विभिन्न वर्गों से संपर्क स्थापित करने में उसे कोई संकोच या हिचकिचाहट नहीं थी। उसने जैकोबिन दल में भी प्रवेश किया था और २० जून के तुइलरिए (Tuileries) के अधिकार के अवसर पर उसे घटनाओं से प्रत्यक्ष परिचय हुआ था। फ्रांस के राजतंत्र की दुर्दशा का भी उसे पूर्ण ज्ञान हो गया था। यहीं से नैपोलियन के विशाल व्यक्तित्व का आविर्भाव होता है।

नेपोलियन बोनापार्ट ने 1799 में सत्ता को हाथों में लेकर अपनी स्थिति सुदृढ़ करने तथा फ्रांस को प्रशासनिक स्थायित्व प्रदान करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में सुधार किए। वस्तुतः डायरेक्टरी के शासन को समाप्त कर नेपालियन ने सत्ता की थी और फ्रांस की जनता ने उस परिवर्तन को स्वीकार किया था तो इसका कारण था वह अराजकता और अव्यवस्था से उब चुकी थी। अतः नेपोलियन के लिए यह जरूरी था कि वह आंतरिक क्षेत्र में एक सुव्यवस्थित शासन और कानून व्यवस्था की स्थापना करे।

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पुर्तेगाल के साथ युद्ध –

पुर्तेगाल का इंगलैंड के साथ व्यापारिक संबंध था किन्तु नेपोलियन के दवाब के कारण उसे इंगलैंड से संबंध तोड़ना पड़ा। इससे पुर्तेगाल को काफी नुकसान हुआ। इसलिए उसने फिर से इंगलैंड के साथ व्यापारिक संबंध कायम किया। इसपर नेपोलियन ने क्रोधित होकर पुर्तेगाल पर आक्रमण कर दिया। यह भी नेपोलियन के लिए घातक सिद्ध हुआ।

स्पेन के साथ संघर्ष-

नेपोलियन की तीसरी भुल स्पेन के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप था। इसके लाखों सैनिक मारे गए। फलत: इस युद्ध में उसकी स्थिति बिल्कुल कमजोर हो गई। जिससे उसके विरोधियों को प्रोत्साहन मिला जब नेपोलियन ने अपने भाई को स्पेन का राजा बनाया तो वहाँ के निवासी उस विदेशी को राजा मानने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने नेपोलियन की सेना को स्पेन से भगा दिया। उस विद्रोह से अन्य देशों को भी प्रोत्साहन मिला और वे भी विद्रोह करने लगे जिससे उसका पतन अवश्यम्भावी हो गया।

रुस का अभियान-

नेपोलियन ने रुस पर आक्रमण कर भारी भुल की रुस ने इसकी महाद्वीपीय व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया। इसपर नेपोलियन ने रुस पर आक्रमण कर दिया। इसमें यद्धपि मास्को पर इसका आधिकार हो गया लेकिन उसे महान क्षति उठानी पड़ी। उसके विरोधियों ने आक्रमण करने की योजना बनाई। इसे आक्रमण में उसे पराजित होना पड़ा।

SIKANDAR MAHAN by RASIK BIHARI

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101 Hastiyan, Jinhonne Duniya Badal Di by Dinkar Kumar

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Socrates by Arun Tiwari

Socrates by Arun Tiwari

Adolf Hitler by Mahesh Dutt Sharma

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SIKANDAR MAHAN by RASIK BIHARI

सिकंदर को ‘विश्‍व-विजेता’ कहा जाता है। वह अपने राज्य मकदूनिया से आँधी की तरह विश्‍व-विजय की चाह में निकला और ईरान; सीरिया; मिस्र; मेसोपोटामिया; फिनीशिया; जुदेआ; गाझा; बैक्ट्रिया को रौंदता हुआ उत्तर भारत पर छा गया। मकदूनिया को छोड़कर बाकी सभी देश इस दौरान फारसी साम्राज्य के अधीन थे और ये इलाका सम्मिलित रूप से सिकंदर के अपने राज्य से लगभग चालीस गुना बड़ा था। 356 ईसा पूर्व में जनमे सिकंदर की मृत्यु की तिथि 11 जून; 323 ईसा पूर्व बताई जाती है। समझा जा सकता है कि अपने 33 साल के जीवन में उसे क्षण भर रुकने का समय नहीं मिला होगा। अपनी दुर्धर्ष इच्छाशक्‍ति के बल पर वह राज्य के बाद राज्य जीतता चला गया और उतनी भूमि पर कब्जा कर लिया; जो ग्रीक लोगों को तब ज्ञात थी। महान् सिकंदर की जीवनी बताती है कि ‘मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए!’

101 Hastiyan, Jinhonne Duniya Badal Di by Dinkar Kumar

मानव सभ्यता के इतिहास का निर्माण कुछ ऐसे असाधारण व्यक्तियों ने किया है; जो मानव जाति की स्मृतियों में सदा-सदा के लिए अमर हो गए हैं। ऐसी असाधारण हस्तियों के बगैर हम एक विकसित दुनिया की कल्पना नहीं कर सकते। संसार के ऐसे विशिष्ट व्यक्तियों की कोई सूची नहीं बनाई जा सकती। प्राचीनकाल से ही इस धरती पर ऐसे कर्मठ और पुरुषार्थी व्यक्तियों का जन्म होता रहा है; जो अपने जीवन और कर्म के जरिए संसार को बदलने में निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। इस पुस्तक में ऐसी ही 101 चुनी हुई हस्तियों की जीवनी प्रस्तुत की गई है।

Socrates by Arun Tiwari

दुनिया भर के दार्शनिकों में सुकरात का विशिष्‍ट स्थान है। उनमें सोचने-समझने की क्षमता थी और वह सत्य एवं न्याय की खोज के प्रति दृढ़-संकल्प थे। वह मानते थे कि एक बेहतर विश्‍व की कल्पना तभी साकार हो सकती है; जब लोग समझदार एवं बुद्धिमान हों। हमें किसी दूसरे के विचारों को यूँ ही स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए; बल्कि उनको आलोचनात्मक तर्क की कसौटी पर परखना चाहिए। सुकरात के विचारों का अध्ययन आज अधिक उपयोगी एवं प्रासंगिक हो गया है। सुकरात की कही हुई बहुत सी बातों को बड़ी प्रसिद्धि मिली। उन्हीं में से एक है—‘बिना जाँचा-परखा जीवन जीने योग्य नहीं होता है।’ उनके प्रिय शिष्य प्लेटो ने कहा था; “उनके समय के जितने भी लोगों को हम जानते हैं; उनमें से वे सर्वश्रेष्‍ठ और सबसे बुद्धिमान तथा अत्यंत न्यायसंगत व्यक्‍ति थे।”

Adolf Hitler by Mahesh Dutt Sharma

ऑस्ट्रिया में जनमा एडोल्फ हिटलर बारह वर्ष तक जर्मनी का शासक रहा। उसके शासनकाल की परिणति द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में हुई, जिसमें लाखों लोग मारे गए। यही कारण है कि आज तक के इतिहास में उसकी गणना सबसे घृणित एवं दुष्ट व्यक्तियों में की जाती है। हिटलर को शुरू से ही कला में बहुत दिलचस्पी थी और वह एक वास्तुकार बनना चाहता था। वह सन् 1913 में म्यूनिख (जर्मनी) गया और वहाँ की कला एवं वास्तुशिल्प ने उसे मोहित कर लिया। एक जर्मन देशभक्त होने के बावजूद उसे कोई सरकारी पद नहीं मिल सका, क्योंकि उसके पास वहाँ की पूर्ण नागरिकता नहीं थी। प्रथम विश्व युद्ध के बाद भी वह सेना में ही रहा और तरक्की करते हुए उसने पुलिस जासूस का दर्जा प्राप्त कर लिया। धीरे-धीरे हिटलर एक अच्छा वक्ता बन गया। उसका भाषण सुनने के बाद लोग पागलों की तरह उसका पीछा करते और वह जो कुछ कहता, उस पर विश्वास कर लेते। हिटलर ने निम्न और मध्य वर्गों के बीच की दूरी को मिटाकर उन्हें एक ही स्तर पर लाने में पर्याप्त सफलता पाई। अंतत: अनेक पार्टियों की मदद से उसने जर्मनी की सत्ता हथिया ली और सेना को अपने नियंत्रण में ले लिया।

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